बलूचिस्तान : किस मुकाम पर पहुंचेगा संघर्ष ?
बलूचिस्तान : किस मुकाम पर पहुंचेगा संघर्ष ?
बीते हफ्ते पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठानों पर हुए जबरदस्त हमले दर्शाते हैं कि बलूचिस्तान का संघर्ष एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। इसकी कमान अब मध्यम वर्ग व महिलाओं के हाथ में है। यह पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा बदलाव है और नई उम्मीद भी।
गत 31 जनवरी को बलूचिस्तान के 12 जिलों में करीब
40 जगहों पर सिलसिलेवार हुए समन्वित हमलों ने पूरे
पाकिस्तान को हिलाकर रख दिया। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के विद्रोहियों ने सुरक्षा प्रतिष्ठानों, पुलिस स्टेशनों और एक जेल को निशाना बनाकर सशस्त्र हमले व आत्मघाती बम विस्फोट किए। यह इस बात का संकेत है कि इस वक्त बलूचिस्तान में हालात सबसे खराब दौर में पहुंच चुके हैं। इतने बड़े स्तर पर समन्वित हमले होना दर्शाता है कि पाकिस्तान सरकार का नियंत्रण वहां से लगभग खत्म हो चुका है और उसकी इंटेलिजेंस पूरी तरह विफल हो गई है।
पाकिस्तान सरकार के सामने मुसीबत यह है कि बलूचिस्तान के आम लोग बिल्कुल खिलाफ हो चुके हैं। बलूचों ने पाकिस्तान के साथ मनोवैज्ञानिक तौर पर सारे संबंध तोड़ लिए हैं। दरअसल, वे ‘पाकिस्तान’ को पाकिस्तान मानते ही नहीं है। इसे वे ‘पंजाबिस्तान’ मानते हैं।
भारत क्या करें?
भारत सरकार का रवैया हमेशा से संयमित रहा है। भारत
अन्य देशों के आंतरिक मामलों में दखल आमतौर पर नहीं
देता है। सैद्धांतिक तौर पर यह ठीक भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान भारत के आंतरिक मामलों में दखल देना बंद करता है! भले ही भारत उनकी आजादी की बात न करें, उन्हें कोई सहायता नहीं दे, लेकिन उन पर हो रहे दमन के खिलाफ कम से कम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी आवाज तो बुलंद करें। हम गाजा को लेकर खूब बातें करते हैं। तो यहां भी करनी चाहिए।
पंजाब के लोग उनके संसाधनों की लूट-खसोट कर रहे हैं।
लड़के-लड़कियों को अगवा कर गायब कर रहे हैं और उन पर जबरदस्त जुल्म ढा रहे हैं। वैसे बगावत के इस नए दौर को भीस25 साल हो गए हैं, लेकिन पिछले चार-पांच साल से इसने काफी जोर पकड़ लिया है, क्योंकि अब भावनाएं कबीलों से निकलकर आम जनमानस के बीच पहुंच गई हैं।
तो नया ‘बांग्लादेश’ बनने की राह पर ?
बलूचिस्तान की जमीनी हकीकतों के मद्देनजर उसकी तुलना बांग्लादेश से करना ठीक नहीं होगा। एक तो उस समय भारत ने बांग्लादेश में सीधा दखल देकर उसे आजाद करवाया था। आज ऐसी स्थिति नहीं है। वैसे भी भारत की बलूचिस्तान से कोई सरहद नहीं लगती। दूसरा, पाकिस्तान उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान (जो बांग्लादेश बना) से हजार मील दूर था। यहां पाकिस्तान के दोनों हिस्से भौगोलिक रूप से जुड़े हैं। तो ऐसी स्थिति में कोई देश वहां जाकर बलूचिस्तान के पक्ष में युद्ध लड़ेगा, ऐसा
संभव नहीं है। आज अलगाववादी मजबूत तो हो गए हैं, मगर इतने भी नहीं कि पाकिस्तानी फौज से सीधे टक्कर ले सकें। हां, वे पाकिस्तान को लगातार थका देने वाली लड़ाई के जरिए कमजोर जरूर कर रहे हैं। हो सकता है, इससे अंततः कोई रास्ता निकलकर आए। रास्ता क्या होगा, यह अभी नहीं कह सकते।
कभी स्वतंत्र रियासत था, जिन्ना ने कर दिया था छल
आजाद बलूचिस्तान को जिन्ना के बल प्रयोग की वजह से करना पड़ा सरेंडर अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान कलात (आधुनिक बलूचिस्तान का बड़ा हिस्सा) का दर्जा अन्य भारतीय रियासतों (जैसे हैदराबाद या पटियाला) से अलग था, यानी नेपाल जैसा था। इसी वजह से ब्रिटिश इंडिया की आजादी के समय बलूच नेताओं ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की थी। मीर अहमद यार खान आजादी के समय
आखिरी सत्ताधारी (खान ऑफ कलात ) थे। ब्रिटिश इंडिया की स्वतंत्रता के समय मोहम्मद अली जिन्ना ने कलात की पूर्ण आजादी का समर्थन किया था। 4 अगस्त 1947 को जिन्ना, माउंटबेटन और यार खान के बीच सहमति बनी कि ब्रिटिश भारत के आजाद होने के अगले ही दिन से कलात भी आजाद मुल्क बन जाएगा। 15 अगस्त 1947 को ऐसा हुआ भी। लेकिन फरवरी 1948 आते-आते जिन्ना ने वहां बल प्रयोग शुरू कर दिया। अंततः 25 मार्च 1948 को खान को पाक में बलूचिस्तान के विलय का एलान करना पड़ा।
बलूचिस्तान की 5 बगावत : राज परिवार की लड़ाई से जन-आंदोलन तक… बलूचिस्तान में पाकिस्तान के गठन से लेकर अब तक कुल पांच प्रमुख विद्रोह हुए हैं। साल 1948 में यह केवल एक ‘राज परिवार’ की लड़ाई थी, लेकिन आज एक जनआंदोलन और सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध में बदल चुकी है।
1. पहली बगावत (1948)
खान ऑफ कलात मीर अहमद यार खान द्वारा दबाव में
आकर पाकिस्तान के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के विरोध में उनके भाई प्रिंस अब्दुल करीम खान ने विद्रोह की कमान संभाली। फिर उन्हें अफगानिस्तान भागना पड़ा। करीम की गिरफ्तारी के साथ ही बगावत खत्म हो गई।
2. दूसरी बगावत (1958-59)
पाकिस्तान की ‘वन यूनिट’ नीति के खिलाफ बगावत की
अगुवाई नवाब नौरोज खान ने की। बलोच लोगों का आरोप था कि इस नीति से बलूच पहचान खत्म हो जाएगी। यह बगावत भी फेल हो गई। खान के बेटों और भतीजों को फांसी दे दी गई। मगर इससे बलोच लोगों में असंतोष और व्यापक हो गया।
3. तीसरी बगावत (1963-69)
पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान में नए सैन्य अड्डे बनाने
और स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण की कोशिश की। इससे विद्रोह पनपा । इसकी कमान शेर मोहम्मद मर्री ने संभाली। हालांकि जनरल याह्या खान ने ‘वन यूनिट’ नीति वापस ली, जिससे वहां कुछ वर्षों के लिए संघर्ष रुक गया।
4. चौथी बगावत (1973-77)
प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा बलूचिस्तान की
अताउल्लाह मंगल के नेतृत्व वाली निर्वाचित प्रांतीय सरकार को बर्खास्त करने से असंतोष फैला। पाकिस्तान ने ईरानी हेलीकॉप्टरों की मदद से बलूच उग्रवादियों पर भारी बमबारी की। 1977 में भुट्टो के तख्तापलट के बाद विद्रोह थमा। इसकी शुरुआत 2000 में बीएलए के सक्रिय होने के साथ ही हो गई थी।
5. पांचवीं बगावत (2000 से आज तक)
• इसकी अगुवाई पहले नवाब अकबर बुगती ने की। अब डॉ. अल्लाह नजर ने इसकी कमान संभाल रखी है। यह अब केवल कबीलाई सरदारों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षाओं का आंदोलन बन गया है।
अब संघर्ष की मशाल महिलाओं के हाथों में बीते कुछ सालों के दौरान बलूचों के इस आंदोलन में काफी कुछ बदल गया है। अब यह आंदोलन अनपढ़ लोगों या केवल
कबीलाई सरदारों के हाथ में नहीं है। अब इसका नेतृत्व डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील और पीएचडी स्कॉलर्स जैसे शिक्षित मध्यम वर्ग के लोग कर रहे हैं। बलूच समाज वैसे तो काफी रूढ़िवादी है, लेकिन जानकर
आश्चर्य होगा कि अब वहां महिलाएं भी आगे आ रही हैं। महरंग बलूच जैसी शिक्षित लड़कियां राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व कर रही हैं। यहां तक कि सशस्त्र संघर्ष में भी शिक्षित और सुलझी हुई लड़कियां शामिल हैं,
जो फिदायीन हमले कर रही हैं।
कौन हैं डॉ. अल्लाह बलूच जिन्होंने बदल दी धारा ?
ये मौजूदा बगावत के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं। वर्तमान में बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट के लीडर हैं, जो इस समय क्षेत्र में सबसे सक्रिय विद्रोही समूहों में से एक है। डॉ. बलूच ने बलूच आंदोलन की पूरी दिशा ही बदल दी है। बलूचिस्तान के विद्रोहों का नेतृत्व हमेशा।कबीलाई सरदारों ने किया। डॉ. बलूच पहले ऐसे नेता हैं जिनका कबीलाई बैकग्राउंड नहीं है । वे एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से।आते हैं और पेशे से एक मेडिकल डॉक्टर हैं।
उन्होंने युवा व मध्यमवर्गीय बलूचों को भी इस आंदोलन से जोड़ दिया है।
पाक का सबसे बड़ा प्रांत क्षेत्रफल : 3.47 लाख
वर्ग किमी (पाक के कुल क्षेत्रफल का 44%)
क्लूचिस्तान आबादी 1.47 करोड़ पाक की कुल आबादी का 5.5%)
कहां से आया बलूच शब्द ?
एम.एल. डैम्स के अनुसार, फारसी में ‘बलूच’ का अर्थ ‘मुर्गे की कलगी’ होता है। उनके मुताबिक सम्राट काइ खुसरू (585 ईसा पूर्व) के लिए लड़ने वाले बलूच सैनिक ऐसी टोपियां पहनते थे जिनके ऊपर कलगी लगी होती थी। इसी वेशभूषा के कारण उन्हें ‘बलूच’ कहा जाने लगा। ‘शाहनामा’ में फिरदौसी ने बलूचों को बहादुर जाति बताया है।
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