गंगा नदी तंत्र

गंगा का बेसिन भारत का सबसे बड़ा नदी बेसिन है। यह देश के 26 प्रतिशत भूभाग पर फैला हुआ है तथा यहां की 43 प्रतिशत आबादी का पोषण करता है। भारत सरकार ने 1986 में गंगा एक्शन प्लान (जीएपी) की शुरुआत की। अगस्त 2009 में पुनर्गठित राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (प्राधिकार) के साथ गंगा एक्शन प्लान को पुनः प्रारंभ किया गया। बीते हुए 30 वर्षों में लक्ष्य समान रहे हैं: प्रदूषण को नदी तक पहुंचने से रोकना। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, सीवेज को रोकना तथा नदी में इसे छोड़ने से पहले ट्रीटमेंट की प्रक्रिया के द्वारा नदी की जल-गुणवत्ता को स्वीकार्य स्तर तक सुधारना (जिसे नहाने योग्य पानी की गुणवत्ता कहा गया है)। किंतु कार्यक्रमों, उपलब्ध कोष तथा थोड़े-बहुत कार्यों के बावजूद, गंगा अब भी प्रदूषित हो रही है। इससे भी बदतर यह है कि हालिया शोधों में दिखाया गया है कि नदी के उन खंडों में भी, जिन्हें पहले साफ माना गया था, अब प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। अब क्या किया जा सकता है?

प्रदूषण

वर्तमान अवस्था, इसके कारण तथा भविष्य की परिकल्पना गंगा एक्शन प्लान (जीएपी-1) में उत्तर प्रदेश, बिहार तथा प. बंगाल में गंगा के किनारे स्थित 25 शहरों को चुना गया था 1993 में द्वितीय चरण (जीएपी-11) में कार्यक्रम को यथावत।जारी रखा गया, किंतु इसमें इसकी चार सहायक नदियों महानदी के कार्य को भी सम्मिलित कर लिया गया। यमुना, गोमती, दामोदर और।अगस्त 2000 में, सरकार ने पुनर्गठित राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए) के साथ गंगा एक्शन प्लान को पुनः प्रारंभ किया। दिनांक 20 फरवरी, 2009 की अधिसूचना के अंतर्गत, सरकार ने इसे राष्ट्रीय नदी का दर्जा प्रदान किया। इसका उद्देश्य था प्रदूषण को पूर्णतः समाप्त करना और नदी का संरक्षण करना पहले और वर्तमान गंगा एक्शन प्लान (जीएपी) के बीच का एक मुख्य अंतर है अब यह स्वीकार कर लिया गया है
कि योजना तथा क्रियान्वयन का आधार संपूर्ण नदी के बेसिन को माना जाना चाहिए।

निचले प्रवाह क्षेत्रों में प्रदूषण के प्रभाव की पहचान किए बिना किसी एक शहर के लिए।योजना बनाना पर्याप्त नहीं है। यह स्वीकार किया गया है कि प्रदूषण नियंत्रण के किसी भी।योजना में नदी में पर्याप्त पानी और इसके प्राकृतिक प्रवाह की आवश्यकता का ध्यान रखा।जाना चाहिए।

तीन मुख्य समस्याएँ हैं, जिन पर गंगा के प्रदूषण का एक समन्वित समाधान तलाशने के संदर्भ में ध्यान देने की आवश्यकता है

■ अपशिष्ट के तनुकरण तथा उसे अंतर्विष्ट करने के लिए नदी में पानी का पर्याप्त प्रवाह ।

■ नदी के किनारे स्थित शहरों के अनुपचारित अपशिष्ट प्रवाह की बढ़ती मात्रा ।

■ नदी में उद्योगों द्वारा अपशिष्ट विसर्जन के स्रोत स्थल प्रदूषण पर रोक का अभाव।

प्रदूषण की चुनौतियां भयावह बनी हुई हैं जुलाई 2013 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आकलन के अनुसार, नदी के ऊपरी प्रवाह को छोड़कर, गंगोत्री से लेकर।डायमंड हार्बर तक के लगभग 2.500 किमी. के मुख्य अपवाह क्षेत्र के सभी खंडों में फीकल कोलीफॉर्म (विष्ठाजनित कोलीफॉर्म जीवाणु) का स्तर स्वीकार्य स्तर से ज्यादा बना हुआ था।।किंतु इन प्रसारों के अलावा, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग जैसे स्थलों पर अपशिष्ट प्रवाह स्तर में वृद्धि के चिंताजनक संकेतों से यह पता चलता है कि इन उच्च- आक्सीजनयुक्त खंडों में भी अपशिष्ट के तनुकरण के लिए पर्याप्त प्रवाह नहीं है (ग्राफ देखें गंगा की यात्रा गंगोत्री से डायमंड हार्बर तक) संवेदनशील स्थलों पर प्रदूषण का स्तर चिंताजनक है, जैसे कि नदी के किनारे स्थित विशाल तथा तेजी से विकसित होते हुए शहरों में सीपीसीबी मॉनिटरिंग आंकड़ों के अनुसार, हरिद्वार, कन्नौज तथा कानपुर के निचले प्रवाह क्षेत्र में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) (जैविक ऑक्सीजन मांग) काफी उच्च स्तर पर तथा वाराणसी में सबसे चरम स्तर पर है। किंतु सबसे चिंताजनक बात यह है कि सभी रही है। इन सभी उच्च जनसंख्या आकीर्ण खंडों के खंडों में प्रदूषण की स्थिति बिगड़ती जा किनारे के भागों में नदी से स्वच्छजल का अंतग्रहण बढ़ता जा रहा है। इस प्रकार से खेती, उद्योग और शहरों के लिए पानी खींचा जाता है, लेकिन बदले में जो वापस किया जाता है वह केवल अपशिष्ट है। मशीनरी की उपयोगिता और दक्षता का अधिक ध्यान रखे बिना ही मूल ढांचे के निर्माण।में वित्तीय कोषों का उपयोग किया गया है लेकिन इन सभी कार्यों के बावजूद, शहर यह लड़ाई जीत नहीं पा रहे हैं।

इसका जवाब है घुलाव (डायल्युशन) और प्राकृतिक प्रवाह (इकोलोजिकल फ्लो)। इसका जवान यह भी है कि जलमल का प्रबंधन कैसे किया जाए और उद्यौगिक प्रदूषण का नियंत्रण कैसे हो

नदी में प्राकृतिक प्रवाह तथा घुलाव क्षमता के लिए जल की उपलब्धता यह स्वीकार करना होगा कि भारत में नदियों की सफाई के लिए, जबकि प्रदूषण नियंत्रण की लागत का प्रबंध करना तथा वहन करना कठिन है, घुलाब-क्षमता के लिए विशाल परिमाण में जल की उपलब्धता असंभव होगी ‘स्वीकार्य जल गुणवत्ता’ के लिए उपलब्धहकराया गया मानक घुलाव कारक 10 है ऐसा इसलिए कि जलाशयों के लिए निःस्राव मान 30 बीओडी निश्चित किया गया है, जबकि स्नान योग्य पानी की गुणवत्ता का मानक 3 बीओडी है। इस तथ्य के मद्देनजर कि अपशिष्ट जल के ट्रीटमेंट की एक बहुत बड़ी समस्या है. मान में कमी लाने की लागत अवहनीय होगी। इसके बदले, जो उपलब्ध कराया जा सकता है. वह जल का पर्याप्त प्रवाह है, जिससे अपशिष्ट के स्वयं निपटान के लिए नदी में अपचयन क्षमता निर्मित हो सकेगी।

इस पर आवश्यक रूप से गौर करना होगा कि जल के बिना नदी केवल एक नाला है। यह भी एक तथ्य है कि, इस अतिरिक्त पानी के छोड़े जाने से ऊपरी प्रवाह क्षेत्र के किसानों को सिंचाई के पानी और शहर तथा उद्योगों को आवश्यक जल से वंचित होना।पड़ेगा। प्राकृतिक प्रवाह के लिए अतिरिक्त जल बखेड़ा खड़ा करेगा। लेकिन इस प्रवाह के।लिए आवश्यक रूप से आदेश देना होगा, क्योंकि यह (प्रवाह) राज्य सरकारों के अपने।जलाशय अधिकार क्षेत्रों के ठिकानों से निकलता है। सरकार के पास इसके बाद यह विकल्प होगा कि वह मानसून जल के संग्रहण के लिए जल भंडारों का निर्माण कर अपनी सीमा मेंहइस प्रवाह के साथ पुलाव क्षमता बढ़ाए, या नदी में पानी छोड़े तथा कृषि, पेयजल या उद्योग।के लिए उपयोग के अन्य विकल्पों का चयन करे। दूसरे शब्दों में सभी उपयोगकर्ताओं को।पानी की आवश्यकता की योजना इस आधार पर बनानी होगी कि नदी कैसे ठीक हो सके,हन कि वे कितना पानी खींच सके।

नदी के सभी खंडों में प्राकृतिक प्रवाह अनिवार्य किया जाएगा। ऊपरी खंडों में, जहां।सामाजिक आवश्यकताओं के साथ ही संकटपूर्ण पारिस्थितिक प्रक्रियाओं के लिए इसकी।आवश्यकता है. इसे मुख्य ऋतु प्रवाह के लिए 50 प्रतिशत तथा अन्य ऋतुओं के लिए।30 प्रतिशत पर नियमित किया जाएगा शहरीकृत खंडों में इसे नदी में अपशिष्ट जल के।निःस्राव के परिमाण के आधार पर नियमित किया जाएगा, और इसका आकलन घुलाव के कारक 10 के आधार पर होगा।।स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत केंद्र सरकार की सभी वित्तीय सहायताएं सशर्त होंगी, जो राज्यों द्वारा नदी को प्राकृतिक प्रवाह के लिए उपलब्ध कराने के परिमाण पर निर्भर होंगी।

इसे मान लें कि शहरी क्षेत्र, प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक रफ्तार और स्तर पर, परंपरागत सीवेज नेटवर्क के निर्माण के लिए मूलभूत संरचना नहीं जुटा पाएंगे अपशिष्ट के संवहन पर पुनर्विचार करना होगा और इसे ट्रीटमेंट प्लांट की योजना बनाते समय लागू करना होगा। इससे नालियों में प्रदूषण के नियंत्रण हेतु नवीन प्रयोगों के लिए नियमों का। कठोर प्रवर्तन किया जाए के रूप में करना होगा या प्राकृतिक प्रवाह के लिए पानी छोड़कर करना होगा। बावजूद इसके कि मौजूदा परिस्थिति में पूंजी और परिचालन लागतो के लिए केन्द्र सरकार से सहायता की जरूरत है. नदी की सफाई के लिए आवश्यक प्रदूषण नियंत्रण के विशाल।इनफ्रास्ट्रक्चर को चलाने के लिए यह दीर्घकालीन रूप से व्यवहार्य नहीं होगा जब तक।राज्यों द्वारा सीवेज ट्रीटमेंट प्रणालियों के निर्माण या उनके रख -रखाव की जिम्मेदारी वहन नहीं की जाती ये किफायती समाधान ढूंढने या परियोजनाओं के क्रियान्वयन की दिशा में रुचि नहीं लेंगे। मौजूदा व्यवस्था में केन्द्र सरकार आधारभूत संरचनाओं के लिए पूरी लागतहउपलब्ध कराएगी और प्लांट के परिचालन की लागत भी मुहैया करेगी। किफायत और धारणीयता के लिए जल अपशिष्ट अवसंरचना की योजना बनाने की प्रेरणा तो पूरी तरह नदारद ही है।

केन्द्र सरकार द्वारा कोष प्रदायन में स्पष्ट शर्त होनी चाहिए कि राज्य द्वारा नदी में निस्सारित।प्राकृतिक प्रवाह की मात्रा या पूंजी तथा अवसंरचना के परिचालन के भुगतान के अनुरूप ही वित्तीय सहायता दी जाएगी। जल उपयोगिताओं के पास परिचालन के लिए शुल्क लगाने, शहर / बस्ती स्तर पर।प्रदूषण भुगतानों के संचयन की अभिनव प्रणालियों के निर्माण हेतु कोई व्यवस्था नहीं है। उद्यौगिक प्रदूषण के नियमों का कठोर प्रवर्तन करें इसका कोई विकल्प नहीं है।

किए गए निस्सरण मानकों के।यह स्पष्ट है कि उद्योगों को देश में वैधानिक रूप से लागू पालन में अवश्य सक्षम होना चाहिए। यूपी में रिकॉर्ड दिखाते।हैं कि 2013 में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निरीक्षण किए गए प्रायः सभी उद्योगों द्वारा मौजूदा मानकों का उल्लंघन किया गया है। कठोर कदम उठाने का समय आ गया है।

कानपुर – इलाहाबाद – वाराणसी , जहां गंगा कई-कई बार मरती है

गंगा के लिए, निचले उत्तरप्रदेश के प्रवाह-खंड से होकर कानपुर से उन्नाव होते हुए, फतेहपुर, रायबरेली और तब मिर्जापुर होकर इलाहाबाद और वाराणसी तक – गुजरने की यात्रा वास्तव में मृत्यु सदृश है नदी को अपने अपशिष्टों के अपचयन का कोई मौका नहीं मिलता, जो इस प्रवाह खंड में इसके किनारे पर स्थित शहरों और उद्योगों द्वारा नदी में लगातार उड़ेले जाते हैं केवल इलाहाबाद में आकर ही इसमें यमुना के द्वारा कुछ “साफ’ पानी डाला जाता है, जो दिल्ली में अपनी यात्रा के बाद, यहां आने तक में थोड़ा सा स्वस्थ हो पाती है। लेकिन यह जो गंगा का इलाका है. यहां भारत के सबसे गरीब लोग रहते हैं, जहां शहरी प्रशासन का लगभग कोई।अस्तित्व ही नहीं है; और जहां इस वजह से प्रदूषण बढ़ता जा रहा है।

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