भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जनक : एलेक्जेंडर कनिंघम
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जनक : एलेक्जेंडर कनिंघम
जन्म 23 जनवरी 1814 | मृत्यु 28 नवंबर 1893
एलेक्जेंडर कनिंघम भारत में पुरातत्व के जनक माने जाते हैं। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थापना की और प्राचीन स्मारकों, शिलालेखों व इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन की मजबूत नींव रखी।
शुरुआत- लॉर्ड एलेक्जेंडर कनिंघम का जन्म लंदन,इंग्लैंड में हुआ । उनका बचपन एक ऐसे परिवार में बीता जहां साहित्य, इतिहास और बौद्धिक गतिविधियों को अत्यधिक महत्व दिया जाता था। उनके पिता एलन कनिंघम एक प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार थे, बड़े भाई जोसेफ डेवी कनिंघम जाने-माने इतिहासकार बने।

शिक्षा- कनिंघम की प्रारंभिक शिक्षा ने उनकी सोच को व्यवस्थित किया। बाद में जब उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण लिया,तो उनमें अनुशासन, अवलोकन और मापन जैसी आदतें विकसित हुई। बचपन से ही जिज्ञासु स्वभाव के थे बाल्यावस्था में ही कनिंघम को पुरानी इमारतों, नक्शों और ऐतिहासिक कथाओं में विशेष रुचि होने लगी थी। वे किसी स्थान या घटना को सतही रूप से स्वीकार करने के बजाय उसके पीछे के कारण जानना चाहते थे। उनका यह जिज्ञासु स्वभाव आगे चलकर पुरातत्व में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ, क्योंकि पुरातत्व मूलतः प्रश्न पूछने और प्रमाण खोजने का विज्ञान है।
21 की उम्र में खोजा सारनाथ का स्तूप
कनिंघम सिर्फ 21 साल के थे जब 1835 में वे वाराणसी (बनारस) में सेना में थे। उन्होंने सारनाथ में मिट्टी में दबे कुछ पुराने टुकड़े देखे । लगा कि यहां कोई बड़ा स्तूप या मंदिर होगा। उन्होंने अफसरों से खुदाई की इजाजत मांगी। पैसे नहीं मिले, लेकिन उनकी जिद से छोटी खुदाई हुई। वहां अशोक का स्तंभ और बौद्ध मूर्तियां मिलीं। यह उनकी पहली बड़ी खोज थी।
कनिंघम ने कुतुब मीनार परिसर के स्तंभों का गहन अध्ययन किया, जहां उन्होंने राजमिस्त्रियों के निशानों (मेसन मार्क्स) और अन्य शिलालेखों को पढ़कर उनका अर्थ समझा।
युद्ध के दौरान भी इतिहास की खोज में रहते थे
1845-49 में सिखों के साथ युद्ध हुए (चिलियनवाला और गुजरात की लड़ाई ) कनिंघम सेना में थे और लड़ाई में हिस्सा लिया। लेकिन युद्ध के बीच भी वे पुराने सिक्के इकट्ठा करते रहते थे। वे युद्ध के मैदान में भी इतिहास ढूंढते फिरते थे। 1848 के आसपास कनिंघम ने गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को चिट्ठी लिखी। कहा कि भारत के पुराने स्थलों की व्यवस्थित खोज होनी चाहिए, ताकि इतिहास पता चले। 1861 में लॉर्ड कैनिंग ने हामी भरी और कनिंघम को भारत का पहला पुरातत्व सर्वेयर बनाया। इसी से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की नींव पड़ी।
हड़प्पा के अवशेषों को गंभीरता से नोट किया बौद्ध स्तूपों, विहारों और नगरों की पहचान 1840-50 के दशक में कनिंघम हड़प्पा ( पाकिस्तान में) गए। तब उन्होंने वहां फैले प्राचीन टीले, ईंटों के अवशेष और एक खास मुहर को गंभीरता से नोट किया। उन्होंने इस मुहर का विवरण और चित्र अपनी रिपोर्ट में शामिल किया, जो हड़प्पा से जुड़ा सबसे पहला वैज्ञानिक और लिखित रिकॉर्ड माना जाता है। कनिंघम के काम ने हड़प्पा को इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के ध्यान में लाया, जिसके बाद आगे की पीढ़ियों ने यहां गहन खुदाई की।
कनिंघम ने पूरे भारत में यात्राएं कर अनेक प्राचीन स्थलों की पहचान की। उन्होंने बौद्ध स्तूपों, विहारों और नगरों को विशेष रूप से खोजा और उनके अवशेषों को दर्ज किया। सांची, सारनाथ, कौशांबी और नालंदा जैसे स्थलों के अध्ययन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि भारत का इतिहास केवल राजवंशों तक सीमित नहीं बल्कि धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास से भी जुड़ा है।
1831 – में कनिंघम ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में एक अभियंता अधिकारी के रूप में भारत में कदम रखा।
1861 – में उनके प्रयासों से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना हुई और वे इसके पहले महानिदेशक बने।














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