के. एम. करिअप्पा – जन्म 28 जनवरी 1899 | मृत्यु 15 मई 1993
शिक्षा करिअप्पा की प्रारंभिक शिक्षा मदिकेरी (कोडागु कर्नाटक) से हुई । बाद में वे लॉर्ड बिशप कॉटन बॉयज स्कूल, बैंगलोर में पढ़े। 1919 में किंग्स कमीशन के तहत ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए।
फील्ड मार्शल कोडंडेरा मदप्पा करिअप्पा, जिन्हें ‘किपर’ के नाम से जाना जाता है, भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ थे।उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा शुरू की और स्वतंत्र भारत की सेना को मजबूत और एकजुट बनाने में अहम भूमिका निभाई। विभाजन के दौरान सेना के विभाजन से लेकर 1947-48 के भारत- पाक युद्ध में पश्चिमी मोर्चे की कमान भी संभाली थी।
योगदान
करिअप्पा ने ब्रिटिश सेना में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहां वे अफ्रीका और बर्मा में लड़े। 1947-48 के युद्ध में उन्होंने पश्चिमी कमान की अगुवाई की। 15 जनवरी 1949 को वे स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय कमांडर-इन- चीफ बने थे।
कर्नाटक में जन्में, द्वितीय विश्व युद्ध में भी लड़े थे
करिअप्पा का जन्म कर्नाटक के कोडागु जिले में एक किसान परिवार में हुआ था। 1919 में वे ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए और धीरे-धीरे उच्च पदों तक पहुंचे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे स्वतंत्रता के बाद 1947 के युद्ध में पश्चिमी मोर्चे के कमांडर रहे।
स्वतंत्रता के बाद संभाली सेना की कमान
1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान करिअप्पा ने सेना के विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1947 -48 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना की कमान संभाली और महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सुरक्षित किया। 15 जनवरी 1949 को जनरल रॉय बुचर के बाद वे भारत के पहले भारतीय कमांडर -इन -चीफ बने। उन्होंने सेना में भारतीय अधिकारियों की संख्या बढ़ाई, प्रशिक्षण को मजबूत किया और सेना को एक राष्ट्रीय संस्था के रूप में स्थापित किया। उन्ही के सम्मान में 15 जनवरी को इंडियन आर्मी डे मनाया जाता है।
जब बेटे को रिहा करने की पेशकश ठुकरा दी
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनके बेटे एयर मार्शल के. सी. नंदा करिअप्पा (तब फ्लाइट लेफ्टिनेंट) का हंटर विमान पाकिस्तान में गिरा और वे युद्धबंदी बन गए। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान (जो कभी करिअप्पा के अधीन ब्रिटिश इंडियन आर्मी में काम कर चुके थे) ने व्यक्तिगत रूप से फील्ड मार्शल करिअप्पा से संपर्क किया और कहा कि वे उनके बेटे को विशेष रूप से रिहा कर देंगे। करिअप्पा ने साफ इनकार कर दिया और कहा- ‘वह मेरा बेटा नहीं, वह एक भारतीय सैनिक है। सभी युद्धबंदी मेरे बेटे हैं। किसी एक को विशेष छूट नहीं मिलनीचाहिए।’ ये किस्सा उनकी निष्पक्षता, अनुशास और राष्ट्रप्रेम को दिखाता है।
सेना में ‘जाति और धर्म’ की राजनीति का अंत
आजादी के बाद जब सेना के पुनर्गठन की बात आई, तो करिअप्पा ने रेजिमेंटों में जाति- आधारित भर्ती का विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय सेना में केवल ‘भारतीय’ पहचान चलेगी। उन्होंने ‘ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स’ की स्थापना की, जिसमें भारत के हर कोने और हर जाति के सैनिकों को शामिल किया गया। उनका मानना था कि एक सैनिक की सबसे बड़ी पहचान उसकी वर्दी और तिरंगा है। 34 साल से भी ज्यादा समय तक सेवा की थी।
1949 में के. एम. करिअप्पा भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने थे।
1950 में उन्हें अमेरिका के ‘लीजन ऑफ मेरिट’ के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया था।
1986 में भारत सरकार ने के एम करिअप्पा को फील्ड मार्शल की उपाधि से नवाजा था।
समय को लेकर सख्ती इतनी कि मीटिंग रोक देते थे
करिअप्पा समय के बहुत पाबंद थे। एक बार जब मीटिंग में कुछ जूनियर ऑफिसर थोड़े लेट आए, तो उन्होंने मीटिंग शुरू नहीं की और कहा- ‘सेना में समय सबसे बड़ा अनुशासन है। अगर हम समय पर नहीं आ सकते, तो युद्ध में कैसे जीतेंगे ?’
खुद कभी लेट नहीं होते थे और सेवानिवृत्ति के बाद भी अकेले में फुल यूनिफॉर्म पहनकर ब्रेकफास्ट करते थे, सिर्फ डिसिप्लिन बनाए रखने के लिए। रिटायरमेंट के बाद वे अपने घर पर किसी भी मेहमान से बिना ‘प्रायर अपॉइंटमेंट’ के नहीं मिलते थे; वे मानते थे कि समय की चोरी करना भी एक तरह का अपराध है।