कई आंदोलनों की प्रेरणा रहा है खेजड़ी का वृक्ष

कई आंदोलनों की प्रेरणा रहा है खेजड़ी का वृक्ष

बीकानेर जिले में खेजड़ी को बचाने के लिए स्थानीय लोग और संत समुदाय आंदोलनरत

बीकानेर में इन दिनों खेजड़ी के पेड़ों की कटाई के विरोध में चल रहा आंदोलन सिर्फ स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है। सड़क निर्माण, बिजली परियोजनाओं और औद्योगिक विस्तार के लिए खेजड़ी को हटाने की कोशिशों ने किसानों, ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को एकजुट कर दिया है। धरना प्रदर्शन और ज्ञापन के जरिए लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि विकास के नाम पर उस पेड़ को क्यों कुर्बान किया जा रहा है, जिसने सदियों से रेगिस्तान में जीवन को संभाल रखा है। यह आंदोलन दरअसल उस टकराव को उजागर करता है, जहां आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और पारंपरिक जीवन-दृष्टि आमने-सामने खड़ी हैं।

पर्यावरण और संस्कृति में खेजड़ी वृक्ष के ऐतिहासिक महत्व

खेजड़ी की क्यों है इतनी अहमियत?

खेजड़ी को राजस्थान का जीवन वृक्ष कहा जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान जोधपुर की स्टडीज बताती हैं कि यह वृक्ष अत्यंत कम वर्षा और भीषण गर्मी में भी जीवित रहता है। इसकी गहरी जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं, जिससे मरुस्थलीकरण रुकता है। खेजड़ी नाइट्रोजन फिक्स करने की क्षमता रखता है, जिससे आसपास की मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। यही कारण है कि खेजड़ी के आसपास उगने वाली फसलें अपेक्षाकृत बेहतर होती हैं। पशुपालन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसकी पत्तियां चारे का अहम स्रोत हैं और इसके फल सांगरी स्थानीय पोषण सुरक्षा का हिस्सा हैं।

क्या साथ -साथ चल सकते हैं विकास और हरे-भरे वृक्ष ?

अध्ययन बताते हैं कि विकास और संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी मानना अब पुरानी और सीमित सोच है। देश और दुनिया में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जहां बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बावजूद स्थानीय वृक्षों और पारिस्थितिकी को बचाया गया। चेन्नई में सड़कों के निर्माण के दौरान कई पेड़ों का सफल स्थानांतरण
किया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पेन और इजराइल जैसे शुष्क देशों के उदाहरण सामने आते हैं। इजराइल में सड़क और सिंचाई परियोजनाओं के दौरान स्थानीय अकासिया और रेगिस्तानी पेड़ों को बचाने के लिए डिजाइन में बदलाव किए गए। कई परियोजनाओं में पेड़ों के चारों ओर संरचना विकसित की गई, न कि पेड़ों को हटाकर ।

संस्कृति में खेजड़ी के क्या हैं मायने?

खेजड़ी का रिश्ता केवल पर्यावरण से नहीं, बल्कि लोक संस्कृति से भी है। राजस्थान के लोकगीतों, कहावतों और कथाओं में खेजड़ी को मां के समान माना गया बिश्नोई समाज की आस्था में यह वृक्ष अत्यंत महत्व रखता है। सामाजिक अध्ययन बताते हैं कि जिन समुदायों का जीवन प्रकृति पर निर्भर होता है, वहां पेड़ केवल संसाधन नहीं बल्कि रिश्ते बन जाते हैं। खेजड़ी उसी भावनात्मक रिश्ते का प्रतीक है, जो राजस्थान के लोगों और उनकी धरती के बीच सदियों से कायम है।

क्या है खेजड़ली की कहानी ?

1730 का खेजड़ली प्रकरण भारतीय पर्यावरण इतिहास का निर्णायक मोड़ माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार जोधपुर के खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई और 1363 लोगों ने खेजड़ी को बचाने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। यह घटना उस दौर में हुई, जब पर्यावरण संरक्षण जैसा कोई आधुनिक विचार मौजूद नहीं था। इसके बावजूद लोगों ने तत्कालीन राजसत्ता आदेश के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। पर्यावरण के विद्वानों का मानना है कि यह विश्व का पहला दर्ज पर्यावरणीय जन-बलिदान था, जिसने आगे चलकर कई आंदोलनों को नैतिक आधार दिया।

खेजड़ी को लेकर कौन-से संघर्ष ?

स्वतंत्र भारत में भी खेजड़ी को लेकर संघर्ष थमे नहीं। नहर परियोजनाओं, राजमार्गों और शहरी विस्तार के दौरान कई बार इसकी कटाई हुई, जिसके खिलाफ स्थानीय स्तर पर विरोध दर्ज किया गया। पर्यावरण अध्ययन बताते हैं किसराजस्थान में जंगल आधारित आंदोलन कम हुए, लेकिन खेतों और पेड़ों को बचाने के आंदोलन अधिक मजबूत रहे। खेजड़ी इन संघर्षों का केंद्र बनी, क्योंकि यह सीधे किसानों और पशुपालकों के जीवन से जुड़ी हुई है।

वृक्ष बचाने और कौन-से आंदोलन?

खेजड़ी का संघर्ष भारत में प्रकृति के लिए हुए बड़े आंदोलनों की परंपरा से जुड़ता है। उत्तराखंड का चिपको
आंदोलन इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है, जहां महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उन्हें कटने से रोका। साइलेंट वैली आंदोलन ने केरल में एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाया। पर्यावरण नीति विशेषज्ञों के अनुसार इन आंदोलनों ने यह साबित किया कि विकास का मूल्यांकन केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावससे भी होना चाहिए।

बीकानेर आंदोलन का क्या है संदेश?

खेजड़ी का संघर्ष बताता है कि स्थानीय समुदाय पर्यावरण के सबसे सच्चे रक्षक होते हैं। यह आंदोलन दर्शाता है कि जब आजीविका, संस्कृति और प्रकृति आपस में जुड़ी हों, तब लोग विकास की ऐसी योजनाओं का विरोध करते हैं जो प्राकृतिक संतुलन को नुकसान पहुंचाती हैं।  ऐसे संघर्ष लोकतांत्रिक भागीदारी, पर्यावरणीय न्याय और नीति निर्माण में स्थानीय आवाज की अहमियत को भी रेखांकित करते हैं। पर्यावरण नीति विशेषज्ञों के अनुसार, इन संघर्षो का संदेश साफ है कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहे।
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