ये भी हमने दिए हैं…

प्राचीन भारत ने सिर्फ़ ‘ज़ीरो’ नहीं दिया, दुनिया को कई ऐसी चीजें भी दीं, जिन्हें आज आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है। हम रोज़मर्रा की साधारण चीज़ों को अनदेखा करते हैं, लेकिन उनके पीछे हज़ारों साल पुरानी भारतीय सोच और अद्भुत नवाचार छिपा है। बटन, रूलर, शैम्पू से लेकर फ्लश टॉयलेट और स्याही तक, भारत ने दुनिया को ऐसा बहुत कुछ दिया जो आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

गहनों की तरह सजते थे बटन आज शर्ट का एक छोटा-सा बटन टूट जाए तो पूरी पोशाक अधूरी लगने लगती है। लेकिन यह साधारण-सी वस्तु लगभग चार हज़ार साल पुराने इतिहास से जुड़ी है। 2000 ईसा पूर्व की सिंधु घाटी सभ्यता में समुद्री सीपियों से बने बटन मिले हैं, जिन्हें सलीक़े से तराशकर ज्यामितीय आकार दिया जाता था और उनमें बारीक छेद किए जाते थे। ख़ास बात यह है कि प्रारंभिक दौर में आभूषण के रूप में पहने जाते थे। वे व्यक्ति की समृद्धि और सामाजिक हैसियत का संकेत माने जाते थे। समय के साथ इनका उपयोग वस्त्रों को व्यवस्थित रखने के लिए भी होने लगा। बाद में ये पूरी दुनिया में फैशन उद्योग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।

पैमाने हाथीदांत से उपजा इसका ख़याल

मानव सभ्यता में नाप और माप की आवश्यकता ने विभिन्न पैमानों को जन्म दिया। सिंधु घाटी सभ्यता स्थल पर खुदाई के दौरान 1,500 ईसा पूर्व के हाथीदांत और शंख से बने पैमाने मिले थे। कहा जाता है कि इन पर बेहद सूक्ष्म और दशमलव आधारित निशान बने थे, जो उनकी सटीक माप प्रणाली को दर्शाते हैं। लोथल और मोहनजोदड़ो से मिले ये प्रमाण बताते हैं कि उस समय के लोग निर्माण और व्यापार के लिए व्यवस्थित और मानकीकृत माप का उपयोग करते थे।

सिर की मालिश की परंपरा भारत में सदियों पुरानी है । हमारे यहां जड़ी-बूटियों और तेलों से बना मिश्रण बालों की सफ़ाई और मालिश के लिए इस्तेमाल होता था। अंग्रेज़ी का ‘शैम्पू’ शब्द हिंदी के ‘चंपी’ से आया है। इसकी जड़ें संस्कृत के ‘चपयति’ में हैं, जिसका अर्थ है ‘मालिश करना’। भारत में लोग रीठा, आंवला और गुड़हल के फूलों के गूदे से बाल धोते थे। यह प्राकृतिक तरीक़ा बालों को चमकदार और मज़बूत बनाता था। जब 18वीं सदी में ब्रिटिश व्यापारी भारत आए, तो उन्होंने इस पारंपरिक पद्धति को अपनाया। उन्हें जड़ी-बूटियों और तेलों से किया जाने वाला यह उपचार बेहद पसंद आया। धीरे-धीरे वे इस पद्धति को अपने साथ इंग्लैंड ले गए।

खुदाई में ढके मिले सीवेज सिस्टम

इतिहास बताता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के अधिकांश घरों में निजी शौचालय होते थे। ये पक्की ईंटों से तैयार किए जाते थे और एक सुव्यवस्थित जल निकासी तंत्र से जुड़े रहते थे। इन शौचालयों में पानी डालते ही गंदगी ढलान वाली नालियों के बाहर बने मुख्य नाले में बह जाती थी। यही मूल ‘फ्लश’ व्यवस्था थी। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाइयों में मिली ढकी हुई नालियां और सीवेज सिस्टम इस बात के प्रमाण हैं। वहीं इस प्रणाली से प्रेरित होकर रोमन और यूरोपीय शहरों में भी सीवेज सिस्टम बने। आज यह तकनीक आधुनिक फ्लश टॉयलेट के रूप में दुनिया में मशहूर है।

‘मसि’ से ‘इंडिया इंक’ तक

लिखित शब्दों को स्थायी रूप देने की कला भी भारत की प्राचीन विरासत का हिस्सा है। चौथी सदी ईसा पूर्व में दक्षिण भारत में.स्याही से लेखन प्रचलित था। ‘मसि’ नामक काली स्याही कार्बन.पिगमेंट से बनाई जाती थी, जो गाढ़ी और टिकाऊ होती थी । बाद में चीन और मिस्र ने भी इसी से प्रेरित होकर कार्बन और गोंद मिलाकर स्याही तैयार की, लेकिन भारतीय स्याही लंबे.समय तक लेखन और चित्रांकन में उपयोग होती रही। आज भी ‘इंडिया इंक’ कलाकारों के बीच लोकप्रिय है, ख़ासकर कॉमिक बुक और स्केच बनाने में।

खेल में छिपा था जीवन-दर्शन बच्चों का प्रिय खेल ‘सांप-सीढ़ी’ दरअसल एक गहरे दार्शनिक विचार से जन्मा था। इसका मूल नाम ‘मोक्षपट’ है। इसमें सीढ़ियां अच्छे कर्मों का प्रतीक थीं, जो मनुष्य को ऊपर ले जाती हैं, जबकि सांप बुरे कर्मों का संकेत थे, जो व्यक्ति को नीचे गिरा देते हैं। ब्रिटिश काल में यह खेल भारत से.इंग्लैंड पहुंचा और फिर 1943 में अमेरिका में लोकप्रिय हुआ। समय के साथ यह बच्चों का मनोरंजक बोर्ड गेम बन गया, लेकिन इसकी मूल भावना कर्म और फल के सिद्धांत पर आधारित है।

डिजिटल युग में अगर किसी एक छोटे उपकरण ने डेटा ट्रांसफर की तस्वीर बदल दी, तो वह है यूएसबी (यूनिवर्सल सीरियल बस)। इस तकनीक के विकास में भारतीय- अमेरिकी कंप्यूटर आर्किटेक्ट अजय भट्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1996 में यूएसबी एक मानक तकनीक के रूप में सामने आया और 2000 के दशक की शुरुआत तक यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया। अजय ने न केवल यूएसबी को सरल और सार्वभौमिक कनेक्टिविटी का माध्यम बनाया, बल्कि एजीपी और पीसीआई एक्सप्रेस जैसी उन्नत तकनीकों पर भी काम किया। उनके नाम 130 से अधिक अंतरराष्ट्रीय पेटेंट दर्ज हैं।
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