कार्ल मार्क्स : जिन्होंने पूंजीवाद को चुनौती देकर कम्युनिज्म की नींव रखी थी

कार्ल मार्क्स जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री और क्रांतिकारी विचारक थे, जिन्होंने कम्युनिज्म की नींव रखी थी। उन्होंने दुनिया को बताया कि पूंजीपति वर्ग किस तरह मजदूरों का शोषण करता है। उनकी लिखी किताब ‘दास कैपिटल’ ‘और ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ ने दुनिया भर में करोड़ों लोगों की सोच बदल दी थी।

शिक्षा- कार्ल मार्क्स ने बॉन विश्वविद्यालय और फिर बर्लिन विश्वविद्यालय से.पढ़ाई की। वे कानून की पढ़ाई करने गए थे, लेकिन जल्द ही.दर्शनशास्त्र और इतिहास में उनकी गहरी रुचि हो गई। 1841 में उन्होंने जेना विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

योगदान- कार्ल मार्क्स का.सबसे बड़ा योगदान उनकी पुस्तकें दास कैपिटल और.कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो हैं। उन्होंने वर्ग संघर्ष का सिद्धांत.दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि एक दिन मजदूर वर्ग.एकजुट होगा और पूंजीवाद को खत्म कर एक समान समाज की स्थापना करेगा।

बचपन से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे.कार्ल मार्क्स का जन्म जर्मनी के ट्रियर शहर में एक यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता हेनरिक मार्क्स एक वकील थे और समाज में सुधार के विचारों को मानते थे। बचपन से ही कार्ल मार्क्स तेज.दिमाग और सवाल पूछने वाले जिज्ञासु स्वभाव के थे। बर्लिन में पढ़ाई.के दौरान उन्होंने देखा कि औद्योगिक क्रांति के बाद मजदूर 14-16 घंटे.काम करने के बावजूद बेहद कठिन जीवन जी रहे थे, जबकि अमीर और.गरीब के बीच की खाई लगातार बढ़ रही थी। इसी अनुभव ने उनके भीतर.सामाजिक असमानता के खिलाफ सोच को जन्म दिया और आगे चलकर.उनकी क्रांतिकारी विचारधारा की नींव रखी। इसके बाद कार्ल मार्क्स ने समाज.और अर्थव्यवस्था को गहराई से समझने के लिए लेखन शुरू किया।

मार्क्स ने अपने करियर की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की थी,.लेकिन उनकी सरकार विरोधी लेखनी के कारण उन्हें जर्मनी छोड़ना पड़ा। वे पेरिस चले गए, यहां उनकी मुलाकात फ्रेडरिक एंगेल्स से हुई। एंगेल्स न केवल उनके सबसे अच्छे दोस्त बने, बल्कि उन्होंने.मार्क्स को आर्थिक रूप से भी सहारा दिया। इन दोनों ने मिलकर ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ लिखा, जिसने पूरी दुनिया में साम्यवाद की.लहर पैदा कर दी। उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण उन्हें फ्रांस और बेल्जियम से भी निकाल दिया गया, जिसके बाद उन्होंने लंदन.को अपना ठिकाना बनाया।

1867 – संघर्षों के बीच लिखी गई ‘दास कैपिटल’ शेक्सपियर.भले ही मार्क्स के विचार दुनिया बदल रहे थे, लेकिन उनका अपना जीवन और साहित्य.बहुत तंगी में बीता। लंदन में रहते हुए मार्क्स इतने गरीब थे कि कई बार के प्रति उनके पास बच्चों के इलाज और भोजन तक के पैसे नहीं होते थे। इसी गरीबी और संघर्ष के बीच वे घंटों ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी में बैठकर शोध करते थे। यहीं उन्होंने अपनी महान रचना ‘दास.कैपिटल’ लिखी थी। मजदूरों के हक की आवाज.मार्क्स ने इंटरनेशनल वर्किंग मेन्स एसोसिएशन की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने काम के घंटों को निश्चित करने और मजदूरों की सुरक्षा के लिए आवाज उठाई। उनके विचारों का ही असर था कि 20वीं सदी में रूस, चीन, वियतनाम और क्यूबा जैसे देशों में बड़ी क्रांतियां हुई।

मार्क्स कला और साहित्य के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उन्हें शेक्सपियर, दांते और गोएथे की रचनाएं जुबानी याद थीं। खास बात यह है कि वे अपने घर में अकसर साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित करते थे, जहां वे अपने परिवार और दोस्तों को महान कवियों की रचनाएं पढ़कर सुनाते थे। उनका मानना था कि एक क्रांतिकारी के दिल में साहित्य के लिए जगह होनी चाहिए, क्योंकि साहित्य ही मनुष्य की संवेदनाओं को जिंदा रखता है। उन्होंने अपने बच्चों में भी यही संस्कार डाले, जिससे उनकी बेटियां भी बड़ी होकर साहित्य और कला प्रेमी बनीं। वे मानते थे कि विचारों की गहराई केवल राजनीति या अर्थशास्त्र से नहीं, बल्कि कला और साहित्य से भी आती है।

जन्म: 5 मई 1818 | मृत्युः 14 मार्च 1883

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