क्या है EQ और IQ ?

एक होता है आईक्यू(IQ) और एक ईक्यू(EQ)। पहले का संबंध बुद्धि से है और दूसरे का भावना से। (EQ)इमोशनल कोशेंट (ईक्यू) यानी भावनात्मक लब्धि भावनाओं को पहचानने, समझने और प्रबंधित करने की मानवीय क्षमता है।

EQ- इस मामले में जो लोग बेहतर होते हैं, वे कम तनावग्रस्त, अच्छे कम्युनिकेटर, अधिक सहिष्णु और आसानी से चुनौतियों से पार पाने वाले होते हैं। इसके अलावा वे अपने आसपास के लोगों की मानसिक स्थिति को परखकर उसके अनुसार कार्य करने में भी दक्ष होते हैं जिसके चलते अक्सर लोगों के बीच आकर्षण के केंद्र बने रहते हैं।

पीटर सलावॉय और जॉन मेयर ने 1990 में इमोशनल इंटेलिजेंस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले किया था। यह बाद में डैन गोलमैन की पुस्तक ‘इमोशनल इंटेलिजेंस-वाई इट कैन मैटर मोर दैन आईक्यू’ से लोकप्रिय हुआ। उनके अनुसार हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के शोध का दावा है कि जीवन में सफलता निर्धारित करने में ईक्यू का महत्व, आईक्यू और तकनीकी कौशल से दुगुना होता है। गोलमैन का मत है कि यह आपके ही नहीं आपके आसपास के जीवन को भी प्रभावित करता है। इसके पांच घटक हैं जिन्हें अपनाकर आप भावनात्मक रूप से सबल बन सकते हैं। डैनियल गोलमैन का भावनात्मक बुद्धिमत्ता सिद्धांत पांच घटकों में वर्गीकृत है।

जीवन में सफलता तीव्र बुद्धि और निरंतर अभ्यास पर टिकी होती है। लेकिन एक बार मिली सफलता कब तक बरकरार रहेगी, इसे निर्धारित करती हैं हमारी भावनाएं। ये मन के भीतर बवंडर सी उठती हैं और व्यक्ति का मानसिक संतुलन ही बिगाड़ देती हैं। इसी बवंडर में उलझे जीवन को स्वहित में साधने और परहित हेतु प्रेरित पाने की क्षमता ईक्यू कहलाती है। सामान्यतः मनुष्य का आईक्यू (इंटेलिजेंस कोशेंट यानी बुद्धि लब्धि) जीवनभर एक-सा रहता है, लेकिन उसका ईक्यू सतत अभ्यास से बढ़ाया जा सकता है। यह भावनाओं को पहचानने, समझने और अभ्यास करने की विधि है।

1 आत्म जागरूकता

इसके अंतर्गत व्यक्ति में अपने भावों-विचारों को जानने और समझने की क्षमता विकसित होती है। यह प्रतिक्रिया पूर्णतः आपके भीतर घटित होती है लेकिन इस आंतरिक प्रक्रिया के अभ्यास का परिणाम आपको भीतर और बाहरी दोनों रूप से प्रभावित करता है। इसके अभ्यास हेतु आप अपनी शक्तियों, कमजोरियों, विचारों और भावनाओं के प्रति सचेत रहें। अपनी भावनाओं को प्रबंधित करने के लिए उन बातों की पहचान करें जो आपको उत्तेजित करती हों। आपके कार्य आपके आसपास के लोगों को कैसे प्रभावित करते हैं इस पर विचार करें और सकारात्मक आत्म-चर्चा करें।

2 आत्म-प्रेरणा

धन और पद केवल बाहरी आनंद के विषय हैं, जिन्हें व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार अर्जित करता है। लेकिन भावनात्मक कुशलता व्यक्ति को आंतरिक आनंद के लिए प्रेरित करती है। छोटे और यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित करें। चुनौतियों को अपने जीवन में आने से न रोकें। ये आपको गतिशील और प्रगतिमान बनाए रखती है। बढ़ती उपलब्धियों के साथ-साथ स्वयं को प्रोत्साहित और पुरस्कृत करें। बाधाओं को अवसरों में बदलने का प्रयास करें।

3 आत्म नियमन

भावनात्मक मस्तिष्क तर्कसंगत फ्रंटल कॉर्टेक्स की तुलना में अधिक तेज़ और अनुभवी होता है। इसीलिए देखा जाता है कि भावनाएं विचारों पर प्रभावी होती नजर आती हैं। दिमाग का ये हिस्सा आवेग के बहाव में आकर काम करता है, लेकिन इसे अभ्यास से साधा जा सकता है। भावनात्मक कौशल से संपन्न व्यक्ति कभी भी आवेग में आकर कोई निर्णय नहीं करता। अपने विचारों और भावनाओं को स्वीकार करना सीखें और भावनात्मक रूप से अधिक सौम्य बनें। नकारात्मक भावनाओं से बचने का प्रयास करें। अपने भीतर सहनशीलता विकसित करें। हर नई चुनौती को एक अवसर के रूप में देखना सीखें। कोई भी प्रतिक्रिया देने से पहले एक बार अवश्य सोचें। गलत हो या सही अपने कार्यों की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार रहें।

4 समानुभूति

ये सहानुभूति से पृथक है। सहानुभूति में जहां किसी दूसरे के प्रति दुःख की अनुभूति प्रकट होती है, वहीं समानुभूति के तहत दूसरे की भावनाओं का अनुभव किया जाता है। इसके माध्यम से जब आप दूसरों की भावनाओं को समझते हैं और उनसे जुड़ते हैं तब चारों ओर से आंखें खोलकर कोई फैसला ले पाते हैं। असहमति के दौरान अपने आप को दूसरे के स्थान पर रखकर देखें। जहां उचित हो अपनी भावनाओं को साझा करने के लिए तैयार रहें। प्रेमपूर्ण ध्यान और सचेतता का अभ्यास करें। अपनी देहभाषा यानी बॉडी लैंग्वेज और हाव-भाव पर ध्यान दें और दूसरों की देहभाषा को पढ़ने का भी प्रयास करें।

5 सामाजिक कौशल

भावनात्मक कुशलता इसी पायदान पर टिकी है कि समाज के एक अभिन्न अंग के नाते हमारे भीतर सभी को साथ लेकर चलने की भावना निहित हो। यह गुण सतत अभ्यास से सीखा जा सकता है। इस हेतु आवश्यक है कि आप मौखिक और अ-मौखिक (देहभाषा से व्यक्त होने वाले) संचार कौशल और आत्मविश्वासपूर्ण नेत्र संपर्क का अभ्यास करें। और दूसरों द्वारा किए गए अच्छे आचरण को अपने जीवन में स्थान दें।

– अपनी प्रतिक्रियाओं को लिखें या रिकॉर्ड करें। जानें कि कौन-सी बातें आपको प्रभावित करती हैं और कौन-सी प्रेरित करती हैं। आपके मूल्य क्या हैं और वे आपके लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं।
– जब भी अपनी ही भावनाओं को लेकर कोई संदेह हो तो अपने से अधिक जागरूक लोगों से मदद मांगने में न हिचकिचाएं।
– अपने किए की जिम्मेदारी स्वयं लें और दूसरों पर दोषारोपण करना बंद करें।
– उत्तेजना में आकर कुछ भी कहने से पूर्व सोचने और सांस लेने के लिए 1 मिनट का समय लें।
– हर कहीं केवल भला-बुरा खोजने से बेहतर है, प्राप्त को पर्याप्त में बदलने का प्रयास करें और आनंद से रहें।
– भाव रसमय जीवन की कुंजी है। अपने मन के भावों को बाहर कैसे प्रकट करना है इस पर विचार करें और सुखमय जीवन का आनंद लें।
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