1 जुलाई से स्कूल खुलेंगे, लेकिन तीसरी भाषा कैसे पढ़ाएं… अब तक तय ही नहीं | नियम लागू, लेकिन तैयारियां अधूरी

CBSE ने इस साल से कक्षा 9 में भी तीसरी भाषा यानी आर-3 अनिवार्य कर दी है। 1 जुलाई से स्कूलों में सेशन शुरू होने वाले हैं, लेकिन अभी तक तय नहीं है कि तीसरी भाषा की पढ़ाई किस किताब से होगी, कितने पीरियड मिलेंगे और जिन बच्चों ने अब तक फ्रेंच-जर्मन जैसी फॉरेन लैंग्वेज पढ़ी हैं, उनका क्या होगा। जयपुर में 60 से 70 CBSE स्कूलों में फॉरेन लैंग्वेज पढ़ाई जा रही है। इस बदलाव से शहर के 25 से 30 हजार बच्चे प्रभावित होंगे। CBSE के नए नियम के अनुसार तीन भाषाएं होनी चाहिए। तीसरी भाषा का बोर्ड एग्जाम नहीं होगा। इसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर ही किया जाएगा। यानी इसे स्कूल-बेस्ड असेसमेंट या इंटरनल असेसमेंट माना जाएगा। कक्षा 10 में भी तीसरी भाषा का मूल्यांकन स्कूल ही करेगा।

9वीं कक्षा के लिए नई किताबें उपलब्ध नहीं हैं। आर-3 पुस्तकों को लेकर भी स्कूल असमंजस में हैं। CBSE ने कक्षा 6 या स्थानीय बोर्ड की पुस्तकों से पढ़ाई कराने का सुझाव दिया है। स्कूलों का कहना है कि 9वीं के छात्रों को छठी की किताबों से पढ़ाना व्यावहारिक नहीं है।

नए नियम का असर विदेशी भाषा शिक्षकों पर भी पड़ेगा। जयपुर के कई CBSE स्कूलों में फ्रेंच और जर्मन के सीमित शिक्षक हैं। स्कूलों का मानना है कि विदेशी भाषा चुनने वाले छात्र घटने पर इनके पीरियड कम हो सकते हैं, जबकि हिंदी व संस्कृत के लिए नए शिक्षकों की जरूरत बढ़ेगी।

CBSE ने यह नियम भारत में ही लागू किया है, जबकि विदेशों में चल रहे CBSE स्कूलों में कोई बदलाव नहीं किया है। ऐसे में अगर कोई छात्र विदेश के CBSE स्कूल से भारत के स्कूल में एडमिशन लेगा, तो उसे परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

सबसे ज्यादा परेशानी उन बच्चों के सामने है, जो कक्षा 6 से 8 तक फ्रेंच और जर्मन लैंग्वेज पढ़ चुके हैं। अगर किसी बच्चे ने अब तक इंग्लिश और फ्रेंच पढ़ी है, तो कक्षा 9 में उसे दो भारतीय भाषाओं की शर्त पूरी करने के लिए हिंदी, संस्कृत में शिफ्ट होना पड़ सकता है। स्कूल प्रिंसिपल्स का कहना है कि कक्षा 9 में बच्चे पहले से मुख्य विषयों के दबाव में होते हैं। ऐसे में अचानक नई भाषा शुरू करना आसान नहीं होगा। अगर बच्चा फ्रेंच या जर्मन पढ़ना जारी रखना चाहता है, तो उसे इसे चौथी भाषा के रूप में पढ़ना पड़ सकता है। इससे बच्चों पर पढ़ाई का बोझ और बढ़ेगा।

CBSE के नए 3-भाषा नियम के खिलाफ 19 माता-पिता और शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर की है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बीच सत्र में बिना सही किताबों और प्रशिक्षित शिक्षकों के यह नियम थोपना बच्चों के ‘शिक्षा के अधिकार’ (Article 21A) और शिक्षकों के ‘आजीविका कमाने के अधिकार’ (Article 19(1)(g)) का सीधा हनन है। सीनियर वकील मुकुल रोहतगी की दलीलों के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने मामले की गंभीरता को समझते हुए केंद्र सरकार, CBSE और एनसीआरटी को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 15-16 जुलाई, 2026 को तय की है।

CBSE EXPERT
डॉ. अशोक वैद, शिक्षाविद

इंटरनल असेसमेंट कह देने से समस्या हल नहीं होगी
CBSE ने इस नियम को सत्र 2029-30 से लागू करने की बात कही थी, लेकिन अचानक बीच सत्र में बिना सही किताबों और प्रशिक्षित शिक्षकों के इसे लागू कर दिया गया। कक्षा 9 बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण क्लास होती है, क्योंकि इस साल से वे 10वीं बोर्ड की तैयारी का बेस बनाते हैं। जिन छात्रों ने कक्षा 6 से 8 तक फ्रेंच या जर्मन जैसी भाषा पढ़ी है, उनके लिए बीच में नई भाषा शुरू करना आसान नहीं होगा। इसके लिए ब्रिज कोर्स, सही स्तर की किताबें और प्रशिक्षित शिक्षक चाहिए। केवल यह कहना कि तीसरी भाषा का मूल्यांकन स्कूल करेगा, से समस्या हल नहीं होगी।
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