आधुनिक रेलवे युग के जनक जॉर्ज स्टीफेंसन जिन्होंने बनाया था पहला स्टीम लोकोमोटिव इंजन

27 सितंबर 1825 को स्टॉकटन और डार्लिंगटन रेलवे लाइन पर दुनिया की पहली सार्वजनिक रेलगाड़ी चली.

जॉर्ज स्टीफेंसन ब्रिटिश इंजीनियर और आविष्कारक थे। उन्हें आधुनिक रेलवे का जनक कहा जाता है। उन्होंने भाप से चलने वाले ऐसे लोकोमोटिव विकसित किए, जिन्होंने रेल परिवहन को व्यावहारिक और व्यावसायिक रूप से सफल बनाया। उनकी बनाई रेलवे लाइनों और इंजनों ने औद्योगिक क्रांति को नई रफ्तार दी।

जॉर्ज स्टीफेंसन का जन्म इंग्लैंड के नॉर्थम्बरलैंड के वायलम गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता कोयला खदान में भाप इंजन चलाते थे। आर्थिक तंगी के कारण जॉर्ज बचपन में स्कूल नहीं जा सके। किशोरावस्था में उन्होंने पशु चराने, जूते साफ करने और खदानों में मजदूरी जैसे काम किए। बाद में उन्होंने रात की कक्षाओं में पढ़ाई शुरू की और गणित तथा इंजीनियरिंग सीखी।

जॉर्ज स्टीफेंसन का सबसे बड़ा योगदान रेलवे परिवहन को व्यावहारिक और भरोसेमंद बनाना था। 1814 में उन्होंने अपना पहला सफल भाप इंजन ‘ब्लूचर’ बनाया, जो कोयले से भरी वैगनों को खींच सकता था। 1825 में उनकी रेलवे लाइन पर दुनिया की पहली सार्वजनिक यात्री रेल सेवा शुरू हुई। 1829 में उनके इंजन रॉकेट ने प्रतियोगिता जीतकर साबित कर दिया कि भाप इंजन भविष्य का परिवहन साधन बन सकता है।

कोयले की खदान से शुरू हुआ था मशीनों का सफर
जॉर्ज जब 14 साल के थे तब उन्हें अपने पिता के साथ कोयले की खान में फायरमैन की नौकरी मिली। वे दिन भर कोयले की कालिख के बीच रहते थे, लेकिन उनका मन हमेशा वहां लगे भाप के पंपिंग इंजनों में अटका रहता था। जॉर्ज काम खत्म होने के बाद रुककर उस भारी-भरकम इंजन के एक-एक पुर्जे को खोलते उसे साफ करते और फिर से जोड़ते थे। बिना किसी ट्रेनिंग के, सिर्फ देखकर और पुर्जों को छूकर वे उस इलाके में इंजनों की खराबी ठीक करने वाले सबसे भरोसेमंद मैकेनिकल इंजीनियर बन गए थे।

मुख्य इंजीनियर बनने के बाद जॉर्ज का सपना था कि कोयले को खदानों से बाहर ले जाने के लिए घोड़ों की जगह भाप की शक्ति का इस्तेमाल किया जाए। 10 महीने की कड़ी मेहनत के बाद, 1814 में उन्होंने अपना पहला इंजन बनाया, जिसका नाम उन्होंने प्रशिया के जनरल के नाम पर ‘ब्लूचर’ रखा। यह इंजन अकेले 30 टन वजन लेकर पहाड़ी रास्ते पर आराम से दौड़ गया। इसी सोच ने उन्हें ऐसा लोकोमोटिव बनाने के लिए प्रेरित किया, जो घोड़ों की जगह रेल पटरियों पर भारी भार खींच सके।

1814 में जॉर्ज स्टीफेंसन ने अपना पहला कोयला ढोने वाला भाप इंजन ‘ब्लूचर’ सफलतापूर्वक निर्मित किया।

1825 में उनके बनाए इंजन ‘लोकोमोशन नंबर 1’ ने दुनिया की पहली सार्वजनिक रेल यात्रा पूरी की। इसमें 450 यात्री सवार थे।

27 सितंबर 1825 को स्टॉकटन और डार्लिंगटन रेलवे लाइन पर दुनिया की पहली सार्वजनिक रेलगाड़ी चली। इस ट्रेन के इंजन लोकोमोशन नंबर 1 को खुद जॉर्ज स्टीफेंसन चला रहे थे। ट्रेन को देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जुटी थी। कई लोगों को लग रहा था कि यह लोहे का दैत्य ब्लास्ट हो जाएगा, लेकिन जब इंजन ने सीटी मारी और 450 यात्रियों व कोयले से भरी बोगियों को खींचना शुरू किया, तो लोग खुशी से चीख पड़े। इस सफर ने इंसानी इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।

उस दौर में कोयला खदानों में मीथेन जैसी ज्वलनशील गैसें जमा हो जाती थीं। जैसे ही खुली लौ गैस के संपर्क में आती, भीषण विस्फोट हो जाता और मजदूरों की जान चली जाती थी। इस खतरे को देखते हुए जॉर्ज ने एक विशेष सुरक्षा दीपक बनाया, जिसे बाद में ‘जॉर्जी लैंप’ कहा गया। इसकी बनावट ऐसी थी कि लौ की गर्मी बाहर नहीं फैलती थी, जिससे आसपास मौजूद गैस में आग लगने का खतरा काफी कम हो जाता था।

जॉर्ज के जीवन का सबसे मुश्किल इम्तिहान तब आया जब उन्हें लिवरपूल और मैनचेस्टर के बीच रेलवे लाइन बिछाने का काम मिला। रास्ते में चैट मॉस नाम का एक विशाल और गहरा दलदल था। बड़े-बड़े सिविल इंजीनियर्स ने हाथ खड़े कर दिए थे, लेकिन जॉर्ज डिगे नहीं। उन्होंने एक अनोखा आईडिया निकाला। उन्होंने दलदल में सूखी लकड़ियों, झाड़ियों और हीदर (एक प्रकार के पौधे) के बड़े-बड़े बंडल बनाकर डाले, जिससे एक तैरता हुआ मजबूत बेस बन गया। इसके ऊपर उन्होंने पटरी बिछाई। जब इस दलदली रास्ते से ट्रेन गुजरी तो हर कोई आश्चर्यचकित था।

जॉर्ज स्टीफेंसन
(जन्म: 9 जून, 1781, मृत्यु: 12 अगस्त, 1848)
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