सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या अब 38

बीते दिनों राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने वाले अध्यादेश को मंजूरी दे दी। इस बदलाव के बाद सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर की कुल संख्या चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को मिलाकर 38 हो जाएगी। खास बात ये है कि जब 1950 में सुप्रीम कोर्ट का गठन हुआ तब सीजेआई समेत रोस्टर के कुल जजों की संख्या 08 थी।

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने अनुच्छेद 124(1) में शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट में एक चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और अधिकतम 7 अन्य जजों का प्रावधान रखा था। हालांकि संसद को जरूरत के हिसाब से यह संख्या बढ़ाने का अधिकार दिया गया। इसके बाद 1956 में बने सुप्रीम कोर्ट (नंबर ऑफ जजेस) एक्ट में चीफ जस्टिस को छोड़कर जजों की अधिकतम संख्या 10 तय की गई थी। इसके बाद समय-समय यह संख्या संसद के माध्यम से बढ़ती चली गई।

सवाल ये उठता है कि संविधान ने तो संसद को जजों संख्या बढ़ाने का अधिकार दिया है। तो अभी अध्यादेश क्यों लाया गया? इसका जवाब संविधान के अनुच्छेद 123 में है। इसके मुताबिक कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है, जब तुरंत कानून की जरूरत होती है और उस समय संसद का सत्र नहीं चल रहा होता। ऐसी हालत में राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकते हैं। यह संसद के कानून जैसा काम करता है। हालांकि इसे संसद सत्र शुरू होने के 6 हफ्तों के भीतर कानून के रूप में पास कराना अनिवार्य होता है।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन इसके लिए नामों की सिफारिश कॉलेजियम सिस्टम के जरिए होती है। कॉलेजियम में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जज शामिल होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 124(3) के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के लिए व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना जरूरी है। साथ ही वह कम से कम 5 साल तक किसी हाई कोर्ट में जज रहा हो या 10 साल तक हाई कोर्ट में वकालत कर चुका हो। नियुक्ति के बाद जज राष्ट्रपति के सामने शपथ लेते हैं और 65 साल की उम्र तक पद पर बने रह सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जजों का वेतन भत्ता तथा अन्य सुविधाओं का खर्चा सरकार की संचित निधि से वहन किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाना बेहद कठिन प्रक्रिया मानी जाती है ताकि न्यायपालिका स्वतंत्र बनी रहे। किसी जज को केवल राष्ट्रपति ही हटा सकते हैं, लेकिन उससे पहले लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरी होता है। विशेष बहुमत का मतलब है कि सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित होकर वोट करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई समर्थन मिलना चाहिए। जज को केवल साबित गलत आचरण या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है।
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