देश में विदेशी कैंपस:15 विदेशी विश्वविद्यालयों को मंजूरी मिली, पहला बैच अगस्त से

देश की उच्च शिक्षा में बड़ा बदलाव आ रहा है। अब आपको यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल, यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क, इलिनाइस टेक, विक्टोरिया जैसी ग्लोबल यूनिवर्सिटी की डिग्री के लिए लंदन, शिकागो या मेलबर्न जाने की जरूरत नहीं है। ये विश्वविद्यालय मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में अपने कैंपस खोल रहे हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक, अब तक 15 विदेशी विश्वविद्यालयों को लेटर ऑफ इंटेंट जारी किए जा चुके हैं। इससे उनके भारत में स्वतंत्र कैंपस खोलने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। इनमें से ज्यादातर कैंपस का पहला बैच अगस्त में शुरू होना है। पहले बैच में प्रत्येक कैंपस में 200 से 250 छात्रों से शुरुआत होने की उम्मीद है। अगले पांच वर्षों में इसे बढ़ाकर सालाना 1,000 से 1,200 छात्र प्रति कैंपस करने का लक्ष्य है।

भारत आ रही इन यूनिवर्सिटीज का विजन सिर्फ डिग्री देना नहीं, बल्कि छात्रों को सीधे इंडस्ट्री से जोड़ना है। यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क के वाइस चांसलर प्रोफेसर चार्ली जेफरी कहते हैं, ‘अंतरराष्ट्रीय उच्च शिक्षा के लिहाज से भारत इस समय शायद दुनिया का सबसे रोमांचक और महत्वपूर्ण देश है। हम भारतीय छात्रों को ये सभी अवसर प्रदान करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। उदाहरण के लिए, हमने हाल ही में ‘एंटरप्रेन्योर्स एसोसिएशन ऑफ मुंबई’ के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो हमारे साथ काम करने के लिए उत्सुक युवा टेक उद्यमियों का एक बड़ा समूह है।” वहीं, भारत आ रही पहली अमेरिकी यूनिवर्सिटी में से एक इलिनोइस टेक के वाइस प्रेसिडेंट मल्लिक सुंदरम ने बताया, ‘हम अमेरिका और दुनिया के अन्य हिस्सों से बेहतरीन विदेशी संकायों की भर्ती प्रक्रिया पर तेजी से काम कर रहे हैं। इसके साथ ही, हमारी नजर भारत के उन उच्च प्रतिभावान प्रोफेसरों और शिक्षकों पर भी है, जिन्होंने खुद अमेरिकी विश्वविद्यालयों से डिग्रियां हासिल की हैं ताकि छात्रों को वही वैश्विक माहौल मिल सके।’

एडिटस की मदद से यूनिवर्सिटी ऑफ एबरडीन (मुंबई), ब्रिस्टल (मुंबई), लिवरपूल (बेंगलुरु), यॉर्क (मुंबई), इलिनोइस टेक (मुंबई), विक्टोरिया यूनिवर्सिटी (दिल्ली) कैंपस खोल रही हैं। मौजूदा सत्र के लिए 10,000 + आवेदन मिल चुके हैं।

12वीं में न्यूनतम 75% और ग्रेजुएशन में 55% – 70% अंक जरूरी हैं। बोर्ड की अंग्रेजी में 70% – 85% अंक होने पर IELTS देने की जरूरत नहीं।

पाठ्यक्रम, परीक्षा और मूल्यांकन पूरी तरह होम कैंपस के वैश्विक मानकों पर आधारित होगा। पहले चरण में एआई, कंप्यूटर साइंस और स्टेम (STEM) विषयों पर फोकस रहेगा।

हां, एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत 1-2 सेमेस्टर विदेश में बिताने का मौका मिलेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क 2 साल मुंबई और 1 साल ब्रिटेन (2+1) का विकल्प दे रही है। ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के भारतीय छात्र क्लाउड के जरिए ब्रिटेन में स्थित 1 अरब डॉलर के एआई सुपरकंप्यूटर का उपयोग कर सकेंगे।

स्थायी भारतीय प्रोफेसरों और विदेशी विजिटिंग फैकल्टी का मिश्रण होगा। विक्टोरिया यूनिवर्सिटी की एक-तिहाई फैकल्टी सीधे मेलबर्न से आएगी।

अगले 5 वर्षों के लिए ₹1,000 करोड़ का फंड है। योग्यता और जरूरत के आधार पर 10% से 100% तक स्कॉलरशिप मिलेगी। एबरडीन 2 लाख / वर्ष यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क का मुंबई कैंपस और ब्रिस्टल 10 लाख वर्ष तक स्कॉलरशिप दे रहीं ।

वर्षों में विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या ढाई गुना तक बढ़ी

आईआईटी / आईआईएम में चयन दर 1% से भी कम है। शेष 99% छात्रों के पास या तो समझौता करने का विकल्प था या विदेश जाकर 80 लाख से 1.2 करोड़ खर्च करने का। विदेशी डिग्रियां सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि करिअर कैपिटल देती हैं यानी बेहतरीन प्रोफेसर, ग्लोबल ब्रांड वैल्यू और मजबूत एलुमनाई नेटवर्क । लागत भी 30-40% कम है।

डेलॉय और नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 2040 तक विदेशी यूनिवर्सिटीज के भारतीय कैंपसों में करीब 5.6 लाख से अधिक छात्र हो सकते हैं। इससे 113 अरब डॉलर (करीब 10.67 लाख करोड़ रुपए)की भारी-भरकम विदेशी मुद्रा देश से बाहर जाने से बच जाएगी। इंफ्रा के लिए 1.9 करोड़ वर्ग फुट के रियल एस्टेट स्पेस की मांग पैदा होगी।

एक्सपर्ट व्यू अश्विन डमेरा, सीईओ, एडिटस (ग्लोबल एडटेक कंपनी) 1 से 2 सेमेस्टर विदेश में पढ़ने का भी मौका मिलेगा, जॉब नेटवर्क भी बढ़ेगा

■■●■■

You may also like...